Saurav Kumar kushwaha

तु बसा ले अपनी आशियाना किसी और डाली पे
तेरी खुशी के लिए खुद को खामोश रखता हूं।
अगर कोई शिकवा है मुझसे तो जा तुझे आजाद करता हूं।

टूटकर बिखर जाते है ।
जब कोई समझकर भी खामोश हो जाते है।

मांगा था ओ मुसाफिर हमसे जल की एक बूंद
और हमने समंदर लुटाया था;
कहा था काटें है राहों में
तो मैंने नूर बरसाया था।
अरे ओ कहीं और के मुसाफिर थे
मेरा शहर तो बस यूं ही बीच में आया था ।

  वक्त लगा था तैयार होने मे आशियाना 
तैयार हुआ तो मौसम बदल चुका था।

उसने वादा किया था 5 दिन बाद मिलने का
किसी ने बता दिया होगा कि ये दुनिया 4 दिनों की है 

ओ सुगंध कहीं नही मिली💐🍁
मैने हर फूल खरीद कर देख लिया

हर कुछ बायां करने वाली लब्ज़ भी
कुछ खास पल पे खामोश हो जता है।
नजरों और बातों की जंग मे ये दिल
तेरी सादगी पे मदहोश हो जता है।
हम तो तेरी सादगी पे पुस्तक ही लिख दूं,
पर मेरे ख्यालों के आगे पुस्तक का
हर पन्ना, छोटा पड़ जाता है।

अपने लब्जों से सजा देता उसे,
अगर तारीफ का मौका मिल जाता
कम्बक्त उसकी तारीफ खुद आईने ने कर दी


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